रविवार, 27 मार्च 2016

१६.७ गुण

गुणाः सर्वत्र पूज्यन्ते महत्योऽपि सम्पदः।
पूर्णेन्दुः किं तथा वन्द्यो किष्कलङ्को यथा कृशः।।७।।

गुण सर्वत्र पूजे जाते हैं , धन चाहे जितना हो वह सब जगह नहीं पुजायेगा।  जिस तरह कि द्वितीया के दुर्बल  चन्द्रमा की वन्दना की जाती है , उस तरह पूर्ण चन्द्रमा की वन्दना नहीं की जाती है।  

१६.६ गुण

गुणैरूत्तमतां  यान्ति नोच्चैरासनसंस्थिताः।
प्रसादशिखरस्थोऽपि किं काकः गरुडायते ? ।।६।।    

मनुष्य अपने गुणों से उत्तम बनता है , ऊँचे आसन पर बैठ जाने से नहीं।  क्या भव्य भवन के शिखर पर बैठकर कौआ कौए से गरुड़ हो जायेगा।

१६.५ विनाशकाल और बुद्धि

न निर्मिता केन न दृष्टपूर्वा न श्रूयते हेममयी कुरंगी।
तथाऽपि तृष्णा रघुनंदनस्य विनाशकाले विपरीतबुद्धिः।।५।।

न कभी किसी ने बताया , न कभी किसी के मुख से सुवर्णमय मृग होने की बात ही सुनी गयी।  फिर भी रामचन्द्रजी को लोभ हो ही गया।  जब विनाशकाल उपस्थित हो जाता है तब समझदार की भी बुद्धि उलटी हो जाती है।

 

१६.४ संसार में कौन

कोऽर्थान् प्राप्य न गर्वितोविषयिणः कस्याऽऽपदोऽस्तङ्गत्ताः
स्त्रीभिः कस्य न खण्डितं भुवि मनः को नाम राज्यप्रियः।
कः कालस्य न गोचरत्वमगमत् कोऽर्थी गतो गौरवम् ?
को वा दुर्जनदुर्गणेषु पतितः क्षेमेण यातः पथि ? ।।४।।   

धन प्राप्त कर किसको गर्व नहीं हुआ ? संसार में कौन ऐसा विषयी पुरुष है कि जिसकी विपत्तियाँ नष्ट हो गयी हैं , कौन ऐसा है जिसका मन स्त्रियों के द्वारा खण्डित न हो गया हो , कौन ऐसा है जो राजा को प्रिय है , कौन ऐसा है जो काल की दृष्टि से बच गया है , कौन ऐसा मनुष्य है जो किसी के यहाँ माँगने के लिए जाकर भी गौरव को प्राप्त हुआ हो , और कौन ऐसा है कि जो दुष्टों की दुष्टता में फँसकर भी कुशलपूर्वक दुनियाँ का रास्ता तै कर गया है?

१६.३ मूर्ख

यो मोहान्मन्यते मूढो रक्तेयं मयि कामिनी।
स तस्यां वशगो भूत्वा नृत्येत् क्रीडाशकुन्तवत्।।३।।

जो मूर्ख यह सोचता है कि , अमुक स्त्री मेरे पर मुग्ध है , वह उसके वशीभूत होकर खिलौने की चिड़िया के समान नाचता रहता है।

१६.२ स्त्रियाँ

जल्पन्ति सार्द्धमन्येन पश्यन्त्यन्यं सविभ्रमाः।
हृदये चिन्तयन्त्यन्यं न स्त्रिणामेकतो रतिः।।१६.२।।

स्त्रियाँ बातें दूसरे से करती हैं , नखड़े के साथ देखती हैं , किसी दूसरे की ओर , मन में सोचती है किसी और को , स्त्रियों का प्रेम एक जगह रहता ही नहीं है।

१६.१ बूढ़े का पश्चात्ताप

न ध्यातुं पदमीश्वरस्य विधिवत्संसारविच्छित्तये
स्वर्गद्वारकपाटपाटनपटुरधर्मोऽपि  नोपार्जितः।
नारीपीनपयोधरोरुयुगलं स्वप्नेऽपि नाऽऽलिङ्गितं
मातुः केवलमेव यौवनवनच्छेदे कुठारा वयम्।।१६.१।।

किसी मुमूर्शु बूढ़े का पश्चात्ताप है कि , संसार के बन्धन को तोड़ने के लिये न मैंने ईश्वर के चरणों का ध्यान किया , न स्वर्ग के दरवाजे तोड़ने की सामर्थ्य रखनेवाले धर्म का ही उपार्जन किया और न कामिनी के कठोर कुच तथा जाँघ का स्वप्न में भी आलिङ्गन किया।  जीवन व्यर्थ ही चला गया।  हम अपनी माता के यौवन को काटने के लिए कुल्हाड़े ही बने और कुछ नहीं।