शनिवार, 26 मार्च 2016

१५.७ योग्य अयोग्य

अयुक्तं स्वामिनो युक्तं युक्तं नीचस्य दूषणम्।
अमृतं राहवे मृत्युर्विषं शङ्कर - भूषणम्।।१५.७।।

अयोग्य कार्य भी यदि कोई प्रभावशाली व्यक्त्ति कर गुजरे तो वह उसके लिए योग्य हो जाता है और नीच प्रकृति का मनुष्य यदि उत्तम काम भी करता है तो वह उसके करने से अयोग्य साबित हो जाता है।  जैसे अमृत भी राहु के लिए मृत्यु का कारण बन गया और विष भी शिवजी के कण्ठका श्रिङ्गार हो गया।

१५.६ अन्याय से कमाया हुआ धन

अन्यायोपार्जितं द्रव्यं दश वर्षाणि तिष्ठति।
प्राप्ते एकादशे वर्षे समूलं च विनश्यति।।१५.६।।

अन्याय से कमाया हुआ धन केवल दस वर्ष तक टिकता है , ग्यारहवाँ वर्ष लगने पर वह मूल धन के साथ नष्ट हो जाता है।

१५.५ धन ही मनुष्य का बन्धु

त्यजन्ति मित्राणि धनैर्विहीनं दाराश्च सुहृज्जनाश्च।
तं चाऽर्थवन्त पुनराश्रयन्तं ह्यर्थो हि लोके पुरुषस्य बन्धुः।।१५.५।।

निर्धन मित्र को मित्र , स्त्री , सेवक और सगे - सम्बन्धी छोड़ देते हैं और वही जब फिर धनी हो जाता है तो वह लोग उसके साथ हो लेते हैं।  मतलब यह कि संसार में धन ही मनुष्य का बन्धु है।

१५.४ लक्ष्मी

कुचैलिनं दन्तमलोपधारिणं बह्वाशिनं निष्ठुरभाषिणं  च।
सूर्योदये वाऽस्तमिते शयानं विमुञ्चति श्रीर्यदि चक्रपाणिः।।१५.४।।

मैले कपड़े पहननेवाला , मैले दाँतवाला , भुक्खड़ , नीरस बात करनेवाला और सूर्योदय तथा सूर्यास्त के समय तक सोनेवाला यदि ईश्वर ही हो तो उसे भी लक्ष्मी त्याग देती हैं।  

१५.३ दुष्ट मनुष्य और कण्टक

खलानां कण्टकानां च द्विविधैव प्रतिक्रिया।
उपानद् मुखभङ्गो वा दूरतैव विसर्जनम्।।१५.३।।

दुष्ट मनुष्य और कण्टक , इन दोनों के प्रतिकार के दो ही मार्ग हैं।  या तो उनके लिए पनही ( जूते ) का उपयोग किया जाय या तो उन्हें दूर ही से त्याग दें।

१५.२ गुरु का एक अक्षर

 एकमेवाक्षरं यस्तु गुरुः शिष्यं प्रबोधयेत्।
पृथिव्यां नास्ति तद् द्रव्यं यद् दत्त्वा चाऽनृणी भवेत्।।१५.२।।

यदि गुरु एक अक्षर भी बोलकर शिष्य को उपदेश दे देता है तो पृथ्वी में कोई ऐसा द्रव्य है ही नहीं जिसे देकर उस गुरु से उऋण हुआ जाय।

 

१५.१ दया

 यस्य चित्तं द्रवीभूतं कृपया सर्वजन्तुषु।
तस्य ज्ञानेन मोक्षेण किं जटाभस्मलेपनै:।।१५.१।।

जिसका चित्त दया के कारण द्रवीभूत हो जाता है तो उसे फिर ज्ञान , मोक्ष , जटाधारण तथा भस्मलेपन की क्या आवश्यकता है ?