शुक्रवार, 25 मार्च 2016

१३.७ आनेवाली विपत्ति

अनागतविधाता च प्रत्युत्पन्नमतिस्तथा।
द्वावेतौ सुखमेधेते यद्भविष्यो विनश्यति।।१३.७।।

जो मनुष्य भविष्य में आनेवाली विपत्ति से होशियार है और जिसकी बुद्धि समय पर काम कर जाती है ये दो मनुष्य आनन्द से आगे बढ़ते जाते हैं।  इनके विपरीत जो भाग्य में लिखा होगा , जो यह सोचकर बैठने वाले हैं उनका नाश निश्चित है।

१३.६ स्नेह

यस्य स्नेहो भयं तस्य स्नेहो दुःखस्य भाजनम्।
स्नेहमूलानी दुःखानि तानि त्यक्त्वा वसेत्सुखम्।।१३.६।।

जिसके हृदय में स्नेह (प्रीति ) है , उसको भय है।  जिसके पास स्नेह है , उसको दुःख है।  जिसके हृदय में स्नेह है, उसी के पास तरह - तरह के दुःख रहते हैं।  जो इसे त्याग देता है वह सुख से रहता है।

१३.५ नम्र

अहो बता विचित्राणी चरितानि महात्मनाम्।
अक्ष्मीं तृणाय मन्यन्ते तद्भारेण नमन्ति च।।१३.५।।

अहो ! महात्माओं के चरित्र , भी विचित्र होते हैं।  वैसे तो वे लक्ष्मी को तिनके की तरह समझते हैं। और जब वह आ ही जाती हैं तो इनके भार से दबकर नम्र हो जाते हैं।

१३.४ आयु , कर्म , सम्पत्ति , विद्या और मरण

आयुः कर्म च वित्तं विद्या निधनमेव च।
पञ्चैतानि च सृज्यन्ते गर्भस्थस्यैव देहिनः।।१३.४।।

आयु , कर्म , सम्पत्ति , विद्या और मरण ये पाँच बातें तभी तय हो जाती हैं , जब कि मनुष्य गर्भ में ही रहता है।

१३.३ स्वभाव देखकर प्रसन्न

स्वभावेन हि तुष्यन्ति देवाः सत्पुरुषाः पिता।
ज्ञातयः स्नान - पानाभ्यां वाक्यदानेन पण्डिताः।।१३.३।।

देवता , भले मानुष और पिता ये तीन स्वभाव देखकर प्रसन्न होते हैं। भाई वृन्द स्नान और पान से तथा वाक्य पालन से पण्डित लोग खुश होते हैं।

१३.२ सामने की बात

गते शोको न कर्तव्यो भविष्यं नैव चिन्तयेत्।
वर्तमानेन कालेन प्रवर्त्तन्ते विचक्षणाः।।१३.२।।

जो बात बीत गयी उसके लिए सोच न करो।  और न आगे होने वाली के ही लिए चिन्ता करो।  समझदार लोग सामने की बात को ही हल करने की चिन्ता करते हैं।

१३.१ उज्जवल कर्म

मुहूर्त्तमपि  जीवेच्च नरः शुक्लेन कर्मणा।
न कल्पमपि कष्टेन लोकद्वयविरोधिना।।१३.१।।

मनुष्य यदि उज्जवल कर्म करके एक दिन भी जिन्दा रहे तो उसका जीवन सुफल है।  इसके बदले इहलोक और परलोक इन दोनों के विरुद्ध कार्य करके कल्प भर जीवे तो वह जीना अच्छा नहीं है।