रविवार, 20 मार्च 2016

८.१० भाव ही प्रधान है

अग्निहोत्रं विना वेदाः न च दानं विना क्रियाः।
न भावेन विना सिद्धिस्तस्माभ्दावो हि कारणम्।।८.१०।।

बिना अग्निहोत्र के वेदपाठ व्यर्थ है और दान के बिना यज्ञादि कर्म व्यर्थ है।  भाव के बिना सिद्धि नहीं प्राप्त होती , इसलिए भाव ही प्रधान है।

८.९ पुरुषों के लिए अभाग्य की बात

वृद्धकाले मृता भार्या बन्धुहस्ते गतं धनम्।
भोजनं च पराधीनं त्रयः पुंसां विडम्बनाः।।८.९।।

बुढ़ौती में स्त्री का मरना , निजी धन का बन्धुओं के हाथ में चला जाना और पराधीन जीविका रहना ये पुरुषों के लिए अभाग्य की बात है।

८.८ व्यर्थ

हतं ज्ञानं क्रियाहीन हतश्चाऽज्ञानतो नरः।
हतं निर्नायकं सैन्यं स्त्रियो नष्टा ह्यभर्तृकाः।।८.८।।

वह ज्ञान व्यर्थ है कि जिसके अनुसार आचरण न हो और उस मनुष्य का जीवन ही व्यर्थ है कि जिसे ज्ञान प्राप्त न हो।  जिस सेना का कोई सेनापति न हो वह सेना व्यर्थ है और जिसके पति न हो वे स्त्रियाँ व्यर्थ है।

८.७ भोजन और पीया हुआ पानी

अजीर्णे भेषजं वारि जीर्णे वारि बलप्रदम्।
भोजने चाऽमृतं वारि भोजनान्ते विषप्रदम्।।८.७।।

जब तक कि भोजन पच न जाय , इस बीच में पीया हुआ पानी विष है , और वही पानी भोजन पच जाने के बाद पीने से अमृत के समान हो जाता है।  भोजन करते समय जल अमृत के समान हो जाता है।  भोजन करते समय जल अमृत और उसके पश्चात् विष का काम करता है।  

८.६ चाण्डाल

तैलाभ्यङ्गे चिताधूमे मैथुने क्षौरकर्मणि।
तावद् भवति चाण्डालो यावत् स्नानं न चाचरेत्।।८.६।।

तेल लगाने पर , स्त्री प्रसंग करने के बाद और चिता का धुआँ लग जाने पर मनुष्य जब तक स्नान नहीं करता तब तक चाण्डाल रहता है।

८.५ यवन से बढ़कर नीच

चाण्डालालां सहस्त्रैश्च सुरिभिस्तत्त्वदर्शिभिः।
एको हि यवनः प्रोक्त्तो न नीचो यवनात्परः।।८.५।।

तत्वदर्शी विद्वानों की राय है कि , सहस्त्रों चाण्डालों के इतना नीच एक यवन होता है।  यवन से बढ़कर नीच कोई नहीं होता है।

८. ४ गुणियों को धन दो

वित्तं देहि गुणान्वितेषु मतिमन्नाऽन्यत्र देहे क्वचित्  प्राप्तं वरिनिधेर्जलं धनमुचां मधुर्ययुक्त्तं सदा। 
जीवाः स्थावरजङ्गमाश्च सकलान् संजीव्य भूमण्डलं भूयः पश्यति देवकोटिगुणितं गच्छेत्तमम्भोनिधिम् ।।८. ४।।

हे मतिमान् ! गुणियों को धन दो , औरों को कभी मत दो।  समुद्र से मेघ के मुख में प्राप्त होकर जल सदा मधुर हो जाता है और पृथ्वी पर चर - अचर सब जीवों को जिला कर फिर वही जल कोटि गुण होकर उसी समुद्र में चला जाता है।