गुरुवार, 17 मार्च 2016

५.७ आलस, पराये हाथ, बीज में कमी और सेनापति विहीन सेना

आलस्योपगता विद्या परहस्तगतं धनम्।
अल्पबीजं हतं क्षेत्रं हतं सैन्यमनायकम्।।५.७।।

आलस से विद्या ,
पराये हाथ में गया धन ,
बीज में कमी करने से खेती और
सेनापति विहीन सेना नष्ट हो जाती है।

५.६ शत्रु

मुर्खाणां पण्डिता द्वेष्या अधनानां महाधनाः।
वाराङ्गना कुलस्त्रीणां शुभगानां च दुर्भगा।।५.६।।

मूर्खों के पण्डित शत्रु होते हैं।
दरिद्रों के शत्रु धनी होते हैं।
कुलवती स्त्रियों की शत्रु वेश्यायें होती हैं। और
सुन्दर मनुष्यों के शत्रु कुरूप होते हैं।

५.५ नहीं हो सकता

निःस्पृहो नाधिकारी स्यान्नाकामो मण्डनप्रियः।
नाऽविदग्धः प्रियं ब्रूयात् स्पष्टवक्त्ता न वञ्चकः।।५.५।।

निस्पृह मनुष्य कभी अधिकारी नहीं हो सकता।
वासना से शून्य मनुष्य श्रिङ्गार का प्रेमी नहीं हो सकता।
जड़ मनुष्य कभी मीठी वाणी नहीं बोल सकता और
साफ़ - साफ़ बात करने वाला धोखेबाज नहीं होता।  

५.४ शील एक सा नहीं हो जाता

एकोदरसमुद्भूता एकनक्षत्रजातकाः।
न भवन्ति समाः शीला यथा बदरिकण्टकाः।।५.४।।

एक पेट से और एक ही नक्षत्र में उत्पन्न होने से किसी का शील एक सा नहीं हो जाता।  उदाहरण - स्वरूप बेर के काँटों को देखो।

५.३ भय

तावद्भयेन भेतव्यं यावद् भयमनागतम्।
आगतं तु भयं वीक्ष्य प्रहर्तव्यमशङ्कया।।५.३।।

भय से तभी तक डरो , जब तक कि वह तुम्हारे पास तक न आ जाय। 
और जब आ ही जाय तो डरो नहीं बल्कि उसे निर्भीक भाव से मार भगाने की कोशिश करो।

५.२ मनुष्य की परीक्षा

यथा चतुर्भिःकनकं परीक्ष्यते निघर्षणं छेदनतापताडनैः।
तथा चतुर्भिः पुरुषं परीक्ष्यते त्यागेन शीलेन गुणेन कर्मणा।।५.२।।

जैसे रगड़ने से , काटने  से , तपाने से और पीटने से , इन चार उपायों से सुवर्ण की परीक्षा की जाती है , उसी प्रकार त्याग , शील , गुण और कर्म इन चार बातों से मनुष्य की परीक्षा होती है।

५.१ गुरु

गुरुरग्रिर्द्विजातीनां  वर्णानां ब्राह्मणो गुरुः।
पतिरेव गुरुः स्त्रीणां सर्वस्याभ्यागतो गुरुः।।५.१।।

ब्राह्मण  , क्षत्रिय  तथा वैश्य इन तीनों का गुरु अग्नि है। उपर्युक्त्त चारों वर्णों का गुरु ब्राह्मण है , स्त्री का गुरु उसका पति है और संसार मात्र का गुरु अतिथि है।